Homeसामान्य ज्ञानछठ पूजा क्यों मनाते हैं | Chhath puja kyu manate hai

छठ पूजा क्यों मनाते हैं | Chhath puja kyu manate hai

छठ पूजा– यह त्योहार अपने आप में अद्भुत और अनुपमेय है । जिसमें आज सायंकालीन अर्घ्य आज था और कल हम सभी लोग उषाकालीन अर्घ्य के साथ भगवान भास्कर को अपना प्रणाम निवेदित करेंगे। यह हमारे प्रकृति प्रेम एवं सामाजिक सद्भाव का सही परिचायक है । इस लेख में हम छठ/छठि पूजा से संबंधित तथ्यों एवं छठ पूजा क्यों मनाते हैं इसके संबंध में जानेंगे । साथ ही माता षष्ठी देवी एवं अन्य पौराणिक आख्यानों के विषय में भी जानेंगे ।

छठ पूजा ( chhath puja) उतरपूर्वी भारत और सीमावर्ती नेपाल क्षेत्र में मनाया जाने वाला लोकास्था का एक महान पर्व है । वस्तुतः दीपावली की शुरुआत से लेकर न केवल भाईदूज बल्कि छठ तक पर्वों की एक शृंखला है । हमारा उत्सवधर्मी समाज इस समयावधि में कुछ न कुछ जरूर मनाता है ।

धनतेरस से शुरू हुई शृंखला यूं तो गोवर्धन पूजा के साथ बाकी जगहों पर समाप्त हो जाती है लेकिन मिथिला प्रदेश बिहार एवं उत्तरप्रदेश में इस के बाद छठ पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं ।

छठ पर्व नहाय-खाय से शुरू होकर उदयमान भगवान सूर्य को उषा अर्घ्य देने तक चलता है । चार दिनों के इस पर्व में पहले दिन को नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना,तीसरे दिन संध्यकालीन अर्घ्य और चौथे दिन उगते हुए सूर्य को उषा अर्घ्य देकर मनाया जाता है ।

वैसे तो लोकजीवन में इस पर्व का अपना सामाजिक महत्व है , जहां इस पर्व की वजह से आसपास के विभिन्न जलस्त्रोत एवं अन्य चीजों की सफाई हो जाती है वहीं पूजा स्थल पर सभी परिचितों से मुलाकात हो जाती है । लेकिन इस पर्व को मनाए जाने का कुछ ऐतिहासिक करण भी है जिनकी चर्चा हम आगे कर रहें हैं ।

आगे सबसे पहले हम जानते हैं छठ पूजा से संबंधित विभिन्न प्राचीन कथाओं को ताकि हम जान पाएं कि आखिर छठ पूजा क्यों मनाई जाती है और छठ पूजा की शुरुआत कहां से हुई । सबसे पहले जानिए रामायण काल से जुड़ी कथा जिसमें भगवान राम एवं माता जानकी ने छठ पूजा की ऐसी प्रचलित मान्यता है ।

छठ पूजा और माता सीता का प्रसंग

विद्वान लोग इस पर्व को मनाने की शुरुआत को रामायण काल से जोड़ कर देखते हैं। जहां भगवान राम 14 वर्ष के वनवास को काटकर और लंका विजय के पश्चात अयोध्या पहुंचे ।  उन्होंने रावण वध के प्रायश्चित पर ऋषियों से मंत्रणा की।  तत्पश्चात मुग्दल ऋषि के परामर्श और आदेश  पर भगवान राम और माता जानकी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में ही रहकर यज्ञ और भगवान सूर्य देव की आराधना 6 दिनों तक की थी । इसे छठ पूजा का प्रारंभ माना जाता है ।

नोट :- (इस कथा का उल्लेख आनंद रामायण में मिलता है । )

ऐसा कहा जाता है कि माता सीता ने यज्ञ में भाग नहीं लेकर ऋषि मुग्दल के आदेशानुसार उनके आश्रम में ही सूर्यदेव की आराधना की । बाद में लोगों ने उसे अपनाया ।

यह स्थान वर्तमान में बिहार राज्य के मुंगेर जिले में अवस्थित है एवं इसे सीताचरण मंदिर के नाम से जाना जाता है । मुंगेर शहर का नाम भी मुग्दल ऋषि के नाम पड़ ही पड़ा है जो बाद में परिवर्तित होकर मुंगेर हो गया है ।

महाभारत काल और छठ पर्व

द्यूत क्रीड़ा में पांडवों ने अपना सर्वस्व गवा दिया तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया था रखा था। इस व्रत से उनकी  मनोकामना पूर्ण हुई और पांडव अपना राजपाट वापस पाने में सफल हुए । तभी से इस पर्व को लोग अपनी मनोकमना पूर्ति के लिए मनाते आ रहे हैं । वहीं कुछ लोग इसे कर्ण से जोड़कर भी देखते हैं उनका मत है कि कर्ण  भगवान सूर्य की उपासना करता था वहीं से इस पर्व की शुरुआत हुई । 

पुराणों में वर्णित छठ का प्रसंग

पुराणों में इस पर्व  को लेकर राजा प्रियंवद और रानी मालिनी से जुड़ी हुई एक और कथा है। कहां जाता है कि इस निसंतान दंपत्ति  के लिए महर्षि कश्यप ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया । दंपति को पुत्र हुआ पर वह बच्चा मृत अवस्था में पैदा हुआ । राजा प्रियंवद इस बात से अत्यंत दुखी हुए। वह अपने पुत्र को लेकर शमशान गए और वहीं उन्होंने अपना प्राण त्यागने का निश्चय किया।

उसी समय ब्रह्मा जी की मानस पुत्री माता षष्ठी देवी प्रकट हुई और उन्होंने राजा से स्वयं उनकी पूजा करने और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करने को कहा ।  माता  की कृपा से राजा प्रियंवद को संतान प्राप्त हुई ।  यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को किया गया तभी से छठ पूजा मनाया जा रहा है ।

कौन हैं छठि मैया

छठि मैया मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई है । इन्हें देवसेना भी कहा जाता है । माता षष्ठी देवी ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं।  माता षष्ठी देवी को शिशुओं की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।  संतान प्राप्ति संतान को दीर्घायु और  स्वस्थ रखने के लिए माता षष्ठी का पूजन अर्चन किया जाता है ।

इन्हें विष्णुमाया तथा बालदा अर्थात पुत्र देने वाली भी कहा गया है। माता षष्ठी देवी अपने योग बल से सदैव शिशुओं के साथ रहती हैं और उन का भरण पोषण एवं रक्षण करती हैं । 

सूर्य षष्ठी क्यों कहा जाता है

लोक आस्था के अनुसार माता षष्ठी देवी भगवान श्री सूर्यदेव  की बहन हैं । हिंदू कैलेंडर के अनुसार  पवित्र कार्तिक मास की  शुक्ल षष्ठी तिथि को माता षष्ठी देवी के साथ भगवान सूर्य की भी उपासना की जाती है । इसलिए इसे सूर्य षष्टि व्रत भी कहा जाता है । 

छठ पूजा

पूजा की तैयारियां

अपने परिजनों और संतान की उन्नति और सुरक्षा के लिए मनाया जाने वाला छठ पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी से नहाए खाए  के साथ शुरू किया जाता है। इस दिन घर और आसपास की साफ सफाई के पश्चात स्नान ध्यान करके सात्विक भोजन लिया जाता है । 

दूसरे दिन  खरना पूजा होती है इसमें उपवास रखने वाली व्रती पूरा दिन निर्जला व्रत करती हैं  निराहार रहती है और शाम को पूड़ी और गुड वाली खीर का प्रसाद लगाया जाता है । इस पूजन के पश्चात आसपास के सभी लोग माता को प्रणाम कर यह प्रसाद ग्रहण करते हैं। 

तीसरे दिन व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन बिना अन्न जल ग्रहण किए रहते हैं । पूरे दिन सायंकालीन अर्घ्य हेतु तैयारियां चलती रहती हैं । शाम में नदी या तालाब के किनारे जल में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है ।  अगली सुबह सपरिवार  पुनः नदी किनारे पहुंचकर उगते हुए सूर्य को उषा कालीन अर्घ्य देकर पूजा करते हैं और इसके साथ ही लोक आस्था का यह महान  पर्व संपन्न हो जाता है । 

सिर पर बांस की टोकरी में पूजा का सामान लेकर अपने घर से नदी तक चलने की परंपरा एक अनोखी छटा प्रस्तुत करता है ।  लोक आस्था के महापर्व छठ के गीतों का कहना ही क्या ! छठ पर्व में पूरा समाज एक रंग में रंगा नजर आता है कहीं कोई भेदभाव नहीं रह जाता ।  इस पूजा में पूरे समाज एक दूसरे का सहयोग करके इस पूजा को बेहतरीन ढंग से  मनाता है। 

सारांश

जिन क्षेत्रों में यह पर्व मनाया जाता है वहां इससे अधिक उत्साह उमंग और तैयारियां शायद ही किसी पर्व में होता है । इसे एक पीढ़ी दूसरे को किसी धरोहर की तरह सौंपती चली आ रही है । छठि व्रत के प्रति आम लोगों के श्रद्धा ,आस्था और विश्वास के कारण ही इसे महापर्व कहा जाता है । आज इस ग्लोबल डिजिटल दुनिया में छठ पर्व भी ग्लोबल हो गई है । आस्था का आलम यह है कि लोग जहां भी भी हो इसे मनाने और छठ घाट पर जाने से नहीं चूकते ! नीचे प्रस्तुत है कुछ अहम जानकारियाँ

  • यह पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है ।
  • कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाने के कारण इसे सूर्य षष्ठी कहा जाता है ।
  • रामायण,महाभारत पुराणों से इसके प्रसंग जुड़े हुए हैं ।
  • लोक आस्था का यह महान पर्व प्रकृति की पूजा से जुड़ा हुआ है ।
  • माता को शिशुओं की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है ।
  • बृह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्‍ठात्री प्रकृति के छठे अंश को देवसेना माना गया है। 

छठ पूजा-2021 से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां

छठ पूजा कब मनाई जाती है ?

छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाई जाती है ।

छठ पूजा कितने दिनों तक मनाया जाता है ?

छठ पूजा वस्तुतः 4 दिनों तक मनाया जाता है जिसमें अंतिम दो दिन क्रमशः संध्या और उषा को सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है ।

छठ पूजा की शुरुआत कहां से हुई ?

छठ पूजा की शुरुआत मुद्गल नामक स्थान से हुई । जो आज मुंगेर नाम से प्रसिद्ध है ।

छठ पूजा में किनकी पूजा होती है ।

छठ पूजा में भगवान सूर्यदेव और माता षष्ठी देवी की पूजा होती है ।

छठ पूजा 2021 (chhath puja 2021) में कब है ?

छठ पूजा 8 नवंबर 2021 से शुरू होकर 11 नवंबर 2021 को समाप्त हो रहा है । जिसमें (Chhath puja 2021 date in bihar) क्रमशः
08 नवंबर सोमवार को नहाय खाय से छठ पूजा का प्रारंभ हो रहा है ।
09 नवंबर अर्थात मंगलवार को खरना है ।
10 नंवबर बुधवार को छठ पूजा में संध्याकालीन सूर्य,डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा ।
11 नवंबर यानि गुरुवार को उगते हुए सूर्य को उषा अर्घ्य देकर पर्व का समापन होगा ।

उम्मीद है छठ पूजा क्यों मनाई जाती है एवं छठ पूजा 2021 से संबंधित यह लेख आपके लिए उपयोगी एवं जानकारी भरा रहा होगा । आवश्यक संसोधन एवं इस लेख पर अपने विचार नीचे कमेन्ट बॉक्स में लिख कर हम तक जरूर भेजें ।

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