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रहीम की जीवनी | Rahim Das Biography in Hindi

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भारत देश मे संतों की परंपरा सदियों से चली आ रही है। अनेक महान ऋषियों और साधु संतों ने इस देश के निवासियों को समय समय पर सही जीवन जीने के मार्ग दिखाए हैं । उनकी शिक्षाएं हमें उनके जीवन यापन विचार और व्यवहार के रूप में मिलती आ रहीं हैं । रहीम को हिन्दी साहित्य में एक बड़ा स्थान प्राप्त है उनकी रचनाएं विभिन्न कक्षाओं में अलग अलग आयु वर्ग के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता ऐसे में उनके बारे में जानना महत्वपूर्ण हो जाता है । चलिए संक्षेप में जानते हैं – रहीम की जीवनी के बारे में ।

रहीम तुलसी दास के समकालीन थे । जिस प्रकार तुलसी दास के दोहों सहित उनकी अन्य रचनाओं के लिए उन्हें जाना जाता है उसी प्रकार रहीम के दोहे भी सीख से भरे हैं एवं बहुत प्रसिद्ध भी है । रहीम सांप्रदायिक सद्भभाव की अपने आप में एक मिशाल हैं तथा निजी जीवन में एक मुस्लिम होते हुए भी हिन्दू धर्म के प्रति उनकी आस्था अध्ययन और सम्मान काबिले तारीफ है ।

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रहीम को इतिहास में एक प्रसिद्ध कवि कला प्रेमी और विद्वान के रूप में याद किया जाता है । इसके साथ ही रहीम अकबर के सेनापति और प्रशासक भी थे । वो अधिक से अधिक दान दिया करते थे । इन सभी बातों से लगता है कि रहीम एक संवेदनशील व्यक्ति होने के साथ ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे ।

रहीम का परिचय

रहीम की जीवनी में आगे प्रस्तुत है समाज में सहिष्णु विचारों के साथ सद्भाव का प्रसार करने वाले महान कवि रहीम का संक्षिप्त परिचय –

नाम रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)
माता का नाम सुल्ताना बेगम
पिता का नाम बैरम खां
धर्म मुस्लिम
जन्म तिथि 17 दिसंबर 1556
मृत्यु 1 अक्टूबर 1627

रहीम जी का जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ था, जो आज पाकिस्तान मे है। उनका पूरा नाम “अब्दुल रहीम (अब्दुरहीम) खानखाना” या अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना था। पिता का नाम ‘बैरमखान’ तथा माता का नाम ‘सुल्ताना बेगम’ था। रहीम के पिता बैरमखान बादशाह अकबर के बेहद करीबी माने जाते थे।

वस्तुतः अपने मृत्यु के समय हुमायूँ ने अपने बेटे और राजपाट के संचालन और सुरक्षा की जिम्मेदारी बैरम खां को ही दी थी । बैरम खां ने बखूबी इस दायित्व का निर्वहन किया और जब अकबर सक्षम हो गया तो उसे राजसत्ता सौंप दी थी । लेकिन बाद के दिनों में बादशाह और उनके बीच मतभेद हो गया ।

अकबर ने बैरम खां के विद्रोह को दबा दिया और उन्हें सपरिवार हज पर भेज दिया । रास्ते में एक अफगानी सरदार मुबारक खां ने गुजरात के पाटण में सहस्रलिंग सरोवर के पास उनकी हत्या कर दी ।

 खबर पाकर अकबर ने बैरम खान की पत्नी सुलताना बेगम और उनके बेटे रहीम को वापस दरबार में बुला लिया और रहीम का पालन पोषण करने की जिम्मेदारी उठाई । अकबर ने दरबार ने सभी को चेतावनी दी कि रहीम को उसके पिता की हत्या के बारे में पता न चल सके और रहीम को सभी प्रकार से खुश रखा जाए !

बाद के वर्षों में अकबर ने रहीम की माँ सुलताना बेगम से विवाह भी कर लिया एवं आगे भी रहीम का अच्छे से ध्यान रखा । अकबर ने रहीम को मिर्जा खां की उपाधि से सम्मानित किया ।

रहीम की शिक्षा दीक्षा

रहीम की शिक्षा अकबर ने ‘मुल्ला मोहम्मद अमीन’ शिक्षक से करवाई। उन्होंने रहीम को तुर्की, अरबी व फारसी की भाषा का ज्ञान दिया। उन्होंने ही रहीम को गणित, तर्कशास्त्र व फारसी सहित छंदों एवं व्याकरण का भी ज्ञान करवाया। रहीम को संस्कृत की शिक्षा उनके ‘बदाऊनी’ नामक शिक्षक से मिली । इसी संस्कृत एवं हिन्दू धर्म के ज्ञान और उनपर अपनी रचनाओं के कारण रहीम आज भी इतने प्रिय बने हुए हैं ।

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रहीम का विवाह लगभग 13 साल की उम्र में हुआ था। उनकी शिक्षा समाप्त होने के बाद अकबर बादशाह ने रहीम की शादी मिर्जा अजीज की बहन ‘माहबानों’ से करवाई थी। ये मिर्जा अजीज एक जमाने में बैरम खां के विरोधियों में से एक था ।

मीर अर्ज का पद

सम्राट अकबर के दरबार में अमीर रहीम को “मीर अर्ज” का पद दिया गया। यह पद मिलने से कोई भी व्यक्ति रातों-रात अमीर हो जाता था। इस पद का अर्थ था कि वह व्यक्ति जनता एव॔ सम्राट दोनों  के लिये सामान्य रूप से विश्वसनीय माना जाता। 

यह ऐसा पद है कि इस के माध्यम से जनता की फरियाद सम्राट तक पहुँचती  थी और सम्राट के द्वारा लिये गये फैसले भी इसी पद के जरिए जनता तक पहुँचाए जाते थे। अकबर ने इस पद का काम-काज सुचारू ढंग से चलने के लिए अपने सच्चे तथा विश्वास पात्र ‘रहीम’ को नियुक्त किया था।

इसके अतिरिक्त अकबर के बेटे सलीम यानि जहांगीर के शिक्षक भी रहीम ही थे ।

रहीम की रचनाएं

रहीम दास की जीवनी में आगे पढिए उनकी रचनाओं के बारे में … रहीम ने कई सारे ग्रंथों और दोहों की रचना की । रहीम और रसखान ये ऐसे दो कवि हुए जिन्होंने मुस्लिम होते हुए भी हिन्दू देवताओं के लिए बहुत कुछ लिखा है । उनकी रचनाएं अत्यंत ही सरल एवं बोधगम्य तरीके से लिखी गई है ।

रहीम ने अपनी रचनाओं में स्वयं को रहिमन नाम से संबोधित किया है और इनकी लेखनी में भक्ति,प्रेम और शृंगार के साथ नीति का भी अनमोल समावेश मिलता है ।

रहीम के ग्रंथों में रहीम दोहावली या सतसई, बरवै, रासपंचाध्यायी,नायिकाभेद, शृंगारसोरठा, फुटकर बरवै, फुटकर छंद तथा पद सवैये सहित अन्य काव्य प्रसिद्ध है। रहीम ने तुर्की भाषा में लिखी बाबर की आत्मकथा “तुजके बाबरी” का फारसी मे अनुवाद किया। “माआसिरे रहीमी”और “आइने अकबरी” में इन्होने “खानखाना” व रहीम नाम से कविता की है।

रहीम ने जहां रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों का समावेश अपने काव्य में किया है वहीं उनकी रचनाओं में ब्रज भाषा , अवधि एवं खड़ी बोली का स्पष्ट प्रयोग देखा जा सकता है ।

रहीम का देहावसान

रहीम की मृत्यु चित्रकूट में 1 अक्टूबर 1627 में लगभग 70 वर्ष की आयु में हुई थी। लेकिन हिन्दी साहित्य में अपने अमूल्य योगदान और अपने कृतितवों के लिए उनका नाम सदैव आदरपूर्वक लिया जाता रहेगा ।

रहीम के प्रिय दोहे

वैसे तो हिंदी में हिन्दी दोहे होते ही बहुत प्रिय हैं । लोग अलग-अलग दोहों से अपनी भावनाओं और बातों को प्रकट करते हैं । रहीम के कुछ मार्मिक दोहे जो विशेषकर हमें भी बहुत प्रिय हैं … कुछ दोहे जो मेरे हृदय के अत्यंत करीब हैं और सामान्य संवेदनशील व्यक्ति को भी प्रिय लग सकते हैं इस प्रकार से हैं-

-1-

यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय।
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस, होत होत ही होय ॥

मित्र, यह दोहा कितना मार्मिक है और मानव जीवन की कितनी गुण बातें अपने में समेटे हुए है ।  सही है जन्म से न तो कोई किसी का मित्रता लेकर पैदा होता है और ना ही किसी का शत्रु बनकर आता है । मान-सम्मान यश और अभ्यास के साथ भी यही सारी बातें हैं।  इन सभी चीजों में वृद्धि धीरे-धीरे ही होती है। क्रमशः ये चीजें मनुष्य के आचरण और प्रयासों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। 

-2-

देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन
लोग भरम हम पर करे, तासो निचे नैन

-3-

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ पड़ जाय ॥

रहीम क्षणिक आवेगों में खुद को संभालने एवं प्रेम तथा भाईचारे को नहीं तोड़ने की सलाह देते हैं और संकेत में कहते हैं कि एक बार टूट जाने पर ये संबंध अपने नैसर्गिक सौन्दर्य और शक्ति को पुनः नहीं प्राप्त कर पाते ।

रहीम के दोहें की बात आगे भी करू तो लेख काफी लंबा हो जाएगा । इस पर विचारक्रान्ति के किसी और आर्टिकल में बात करेंगे । अभी के लिए इतना ही ।

हमें पूरा विश्वास है कि रहीम दास की जीवनी लिखने का हमारा यह प्रयास आपके लिए उपयोगी रहा होगा । इस लेख में आवश्यक संसोधन हेतु आपकी टिप्पणियाँ और इस लेख पर आपके विचारों का नीचे कमेन्ट बॉक्स में स्वागत है । इस लेख को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल्स पर शेयर भी करे क्योंकि Sharing is Caring !

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विचारक्रान्ति के लिए लेखन सहयोग -सुवर्णा जगताप

स्त्रोत संदर्भ : महान कवि रहीम

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VicharKranti Editorial Team
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