lehron se darkar nauka paar nahi hoti-लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

poem:”lehron se darkar nauka paar nahi hoti”

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हर नहीं होती

इस आर्टिकल में आपके लिए एक महान प्रेरणादायक हिन्दी कविता । आपको कविता पर ले चलने से पहले थोड़ी भूमिका -साथियों ! मानवीय जीवन में जय और पराजय, उत्सव और उदासी, हर्ष और शोक, निराशा और अकेलापन यह सभी भाव अवश्यम्भावी हैं ।

जीवन है तो परिस्थितियां अनुकूल भी होगी और प्रतिकूल भी ! लेकिन प्रतिकूलताओं को जीवन पर हावी नहीं होने देना और विकट स्थितियों में भी अच्छे नीति नियम और सिद्धांत का निर्वहन करना ही एक शानदार जीवन की निशानी है ।

ऐसी खबरों से तमाम अखबारों के पन्ने भरे पड़े रहते हैं, जहां हताशा-निराशा का शिकार होकर, अपने सपनों के टूट जाने पर लोग अपने अमूल्य जीवन को समाप्त कर मौत का आलिंगन कर लेते हैं ।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती यह कविता ऐसे में टूटे हुए मन और हारे हुए व्यक्ति को एक सम्बल की तरह सहारा देती है । यह कविता किसी प्रकाश स्तम्भ की भांति प्रतिकूलताओं में भी, जीवन के झंझावातों में भी जीवन पथ को आलोकित करती है ।


कठिन परिस्थितियां जो हमारे सामने आती हैं, उसे भी परमात्मा का एक आशीर्वाद ही समझना चाहिए । हमारे जीवन में आयी समय की प्रतिकूलता, वस्तुतः हम सबके भीतर कठिन समय में संघर्ष करने हेतु आवश्यक बल भरने के लिए ही आती हैं।

जीवन में जय-जयकार यदि इतना सहज हो गया, तो इस दुनिया में कुछ सार्थक करने और इस धरती को थोड़ा और खूबसूरत बनाने में भला कौन अपने पसीने का मोती लुटाएगा … ! किसी शायर ने क्या खूब कहा है

मेहनत से मिल गया जो सफ़ीने के बीच था
दरिया-ए-इत्र मेरे पसीने के बीच था

संघर्षों में भी दृढ़ मनोबल एवं धैर्यवान होकर अगर आप समाधान खोजेंगे तो यह अवश्य ही मिलेगा। मानव जिजीविषा का यह क्रांतिगीत पराजय के भाव से ग्रसित, कुंठित मानव-मन को, धैर्यपूर्वक संघर्ष करने की प्रेरणा देती है ।

आखिर हमारे उपनिषद भी तो यही कहते हैं- चरैवेति, चरैवेति ! चलना ही जीवन और जगत के मूल में है । चलना ही, संघर्ष करना ही जीवन है और ठहर जाना ही मृत्यु है !

इतनी सुन्दर प्रेरक कविता के रचयिता सालो साल अनजान रहे । विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हरिवंश राय बच्चन एवं महाप्राण निराला को इस मोहक रचना का श्रेय दिया गया ।

ये महान रचनाकरगण अगर जीवित होते तो स्वयं कहते कि इस कविता के वास्तविक रचनाकार हैं राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित यशस्वी रचनाकार सोहनलाल द्विवेदी

आगे आप स्वयं ही पढिए कविता – लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती …

lehron se darkar nauka paar nahi hoti

lehron se darkar nauka paar nahi hoti,koshish-karne-walo-ki har-nhai-hoti,

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना, ना अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर, खाली हाथ लौट कर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


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